ब्लोगिंग जगत के पाठकों को रचना गौड़ भारती का नमस्कार

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सोमवार, २ नवम्बर २००९

मदद














एक झिंगुर आया
मेरी तर्जनी उठी उसे
उसकी दिशा में नचाया
गोल गोल वर्तुलाकार
भयभीत सी आंखें
विचलित मन:स्थिति थी
कभी वो नीचे तो मैं
पलंग पर चढ़ी थी
गोल चमकती आंखों से
उसने मुझको देखा
मैं तो बहुत छोटा हूं
मुझ से भय कैसा
राम हनुमान सभी पुकारे
लोग कमरे में बैठे सारे
कोई नहीं मदद को आया
झिंगुर ही दिमाग में
वो पंक्तियां लाया
जो अपनी मदद आप हैं करते
भगवान भी उनकी मदद को आ धमकते

गुरुवार, २९ अक्तूबर २००९

बंटवारा





















हाफ पेन्ट की अदला बदली
किया कंचों का था बंटवारा
क्यों जवां होकर बढ़ी दूरियां
हुआ जायदाद का बंटवारा
लड़ जाते थे हर किसी से
था अपना भाई सबसे प्यारा
दुनियां की ऐसी हवा चली
मीठा खून लगे अब खारा
थे जो मां के राम लखन
किया था संग कुल का उजियारा
आज बनकर रावण विभीषण
कर दिया कुल का ही बंटवारा
खींच रेखा संबंधों में अपने
जीते जी कौशल्या को मारा
स्वर्ग से सुन्दर घर को तोड़
तेरा-मेरा घर कर डाला

शुक्रवार, १६ अक्तूबर २००९

उजाला ले लो

HAPPY DIWALI













कहती है जोत तुम मेरा उजाला ले लो
सूरज में तपन है मेरी शीतल ज्वाला ले लो
जानते हैं परवाने शमां पिघल जाएगी एक दिन
उत्सर्ग से पहले उनकी वफा का एक कतरा ले लो
दरकते घर,वीरान गाव फिर शमशान बने इससे पहले
कुछ किलकारियों कहकहों की गूंज ले लो
कहती है जोत तुम मेरा उजाला ले लो
तुम अकेले नहीं हिम्मत है, हौसला और है जुनूं
तो स्फुटित गेंहूं के एक दाने का अंकुर ले लो
रोशनी रोशनी होती है चांद की हो या सूरज की
तपस्वियों के ओज से ही कुछ रश्मियां उधार ले लो
यूं तो कई रंग हैं नीले अस्मां में इन्द्रधनुष के
तुम अपने लहू का रंग अपने उत्सर्गों को दे दो
देखो फिर बसेगें गांव फिर शहर हरे होगें
तुम इंसान हो तो इंसानियत का हवाला ले लो

बुधवार, ७ अक्तूबर २००९

चांद का इंतज़ार













चांद का इंतज़ार किसे नहीं होता
कौन सा जहान है, ये जहां नहीं होता
इंतज़ार किया और सदा करेंगें
प्रेमी जोड़े समन्दर किनारों पर
उड़ते पक्षी दरख्तों की डालों पर
थके मांदे लोग घरौंदों में जाने पर
मंगलकामना करती सुहागनें करवाचौथ पर
रोजे इफ्खार के पिपासे ईद पर
बिछड़े मीत मिलने की उम्मीद पर
नवजात कोख से बाहर आने पर
दिन गिनने वाले तारीख बदलने पर
दूधिया लिबास का गहरे आकाश पर
चांद का इंतज़ार किसे नहीं होता
चांद का इंतज़ार किसे नहीं होता

शनिवार, २६ सितम्बर २००९

रावण की चाहत





















सभी ब्लोगर पाठकों को दशहरे की हार्दिक शुभकामना
एक बार रावण का कुछ मूड बदला
उसका ध्यान अंतरंगता की ओर लपका
अपने दसों सिरों से
चुंबनों की इच्छा जागी
दस्यु सुन्दरियों के लिए
विज्ञापन निकाला,
बना अनुरागी
सुन्दरियां आयीं, इंटरव्यू हुए,
रावण के चुनाव घोषित हुए
विज्ञापन में पहले ही छपा था,
सुन्दरियों को भी पता था
कमसिन, दुबली कन्याएं चाहिएं थीं,
जगह की कमी बताई गई थी
हर सिर के आगे प्रत्येक को खड़ा होना था,
भीड़ बढ़ गई
रावण ने ये सोचा न था
यूं घिर जाएगा सुन्दरियों से कि
सिर के सिर से जुड़े होने से
सांस लेना मुश्किल होगा
खैर ! कामुक बली ने
नरसंहार तो बहुत किए थे मगर
आज से पहले न कभी
महाराज ऐसे चक्कर में पड़े थे
चुबंनों के लिए दस्युओं ने जैसे ही अधर मिलाए
दसों सिर कंपित हुए, सीधे बस शिवजी याद आए

शनिवार, १९ सितम्बर २००९

जिन्दगी है तो


जिन्दगी है तो कुछ हादसे भी होंगें
हम तो बेमतलब ही डरा करते हैं
कलाम कुछ लिखेंगें तो कुछ कमाल भी होंगें
तहरीर कहती है जहन में आपका बसेरा है
मशअले दर्द शामों सहर जलाने होंगें
इकरार से क्यों बेसबब ही डरते हैं
कभी तो सागरों में चांद उतरे होंगें
उसी से चकोर आज तक मदहोश रहते हैं ।

सोमवार, ७ सितम्बर २००९

चुभन



मन की मीठी चुभन को
शब्दों के जरिये मत तोलो
एक हूक सी उठी है अंदर
जिसे न चाहकर भी महसूस करो
बहुत हैं तुम पर जहां लुटाने वाले
मत सोचो अरमानों को ऐसे
मन की अगन बुलाती है
तुम चुपचाप गुजर जाओं बस
आहट पर तुम्हारी दुआ न आए
हम सोच भी न सकेगें कभी
शरबती आंखों की झील में
डुबोकर अपने को हिलोरें ले लो
दूरी से न ये टूटेगी डोर कभी
सपनों को छुपा लो आंचल मे
गज+ब होगा न कोई अब
तुम धीरे से चले जाओ
लेकिन एक गुजारिश है तुमसे
मन की इस मीठी चुभन को
शब्दों के जरिये मत तोलो

सोमवार, ३१ अगस्त २००९

आसान नहीं

दामन में लगे दाग तो फिर भी
धुल जातें हैं मगर
नजरों के दामन में लगे दागों
को धोना आसान नहीं
दीवारों की दरारें तो फिर भी
पट जाती हैं मगर
पड़ गई दिल की दरार
को पाटना आसान नहीं
नजरों के दामन में लगे दागों
को धोना आसान नहीं
जिस्म के बैर तो फिर भी
मान जाते हैं मगर
रुह के बैर को
मनाना आसान नहीं
तपती दुपहरी में फिर भी
मिलते हैं कुछ अपने मगर
गुजरती शामों के सायों मे
उन्हें भुलाना आसान नहीं
नजरों के दामन में लगे दागों
को धोना आसान नहीं
टूटते रिशते नई दिशा में फिर भी
जुड़ जाते हैं मगर
ख्वाहिश की चरमराती यादों में
तुम्हें भुलाना आसान नहीं
नजरों के दामन में लगे दागों
को धोना आसान नहीं

शनिवार, १५ अगस्त २००९

मेरे ब्लोग का प्रथम जन्म दिवस

हमारे देश की आज़ादी की 62 वीं वर्षगांठ पर समस्त ब्लोगर व पाठकों को रचना गौड़ भारती की हार्दिक शुभकामनाएँ। इन स्वतंत्रता प्राप्ति की पावन स्मृतियों के संग मेरे ब्लोग की प्रथम वर्षगांठ भी पूर्ण हुई है । साल भर में आप लोगों का जो स्नेह ,प्रोत्साहन व आशीर्वाद मुझे प्राप्त हुआ उसके लिए तह दिल से मैं आपकी शुक्रगुज़ार हूं। चाह यही है, आसमान में ऊँची मैं उड़ जाऊँ, आज़ादी के ज़श्न के संग- संग, अपने ब्लोग की प्रथम वर्षगांठ का ज़श्न मैं मनाऊं ।
इस खुशी की बेला में आप लोगों के लिए एक कविता पेश है ।

स्वाभिमान का पंछी
क्षितिज पाने की चाह में
आकाश की ऊँचाई चढ
बहेलियों से दूर बहुत दूर
आज़ादी का पंछी उड़ान भर रहा है
नापा है आकाश उसने
अपने इन्ही कमज़ोर पंखों से
रोएं-रोएं में जैसे कोई जोश भरा है
टूटते बनते घोसलों की फ़िक्र नहीं
सतत प्रक्रिया और कर्म स्थली से बंधा है
असली नकली की पहचान है उसको
काले दानों से सफ़ेद दाने अलग कर रहा है
न तो आज़ादी में कोई ठग सकता है
न ही मैत्री समझौता हो सकता है
क्योंकि बहेलियों का गुलेल से रिश्ता है
चिंचिंयाहट में प्रेम तराने सुनकर उसके
स्वर लहरियों में आत्मविश्वास बड़ा है
इसी से मेरा देश स्वाभिमान खड़ा है

सोमवार, १० अगस्त २००९

मुलाकात


कल रात एक अनहोनी हो गई
मेरी मुलाकात मेरे ज़मीर से हो गई
अनगिनत सवाल थे और जवाब मेरेे
जवाब देते देते नज़र मेरी झुक गई
कल रात एक अनहोनी हो गई
तराजू था निगाह में दुनियां के वास्तेे
आज मेरी निगाह ही मुझसे झुक गयी
कल रात एक अनहोनी हो गई
आइ्रने ने गिरा दी गर्त की सारी परतें
चुप्पी होठों की इकरार-ए -खता कर गई
कल रात एक अनहोनी हो गई